प्रकृति के विभिन्न रूपों में चेतना की मात्रा

इस संसार में उपस्थित प्रकृति के सभी व्यक्त और अव्यक्त रूपों में एक ही चेतना विद्यमान है . इस चेतना का प्रतिशत सब रूपों में अलग अलग होता है . ऊर्जा की अभिव्यक्ति को शास्त्रों में कला के रूप में व्यक्त किया गया है. सम्पूर्ण चेतना की मात्रा सोलह कला है .

प्रकृति के अन्य स्वरूपों में चेतना की मात्रा इस प्रकार है –
* पत्थर में चेतना की मात्रा – १ कला
* जल में चेतना की मात्रा – २ कला
* अग्नि में चेतना की मात्रा – ३ कला
* वायु में चेतना की मात्रा – ४ कला
* आकाश में चेतना की मात्रा – ५ कला
* वनस्पतियों और पशुओं में चेतना की मात्रा – ५ कला
* मनुष्यों में चेतना की मात्रा – ६ – ७ कला
* महापुरुषों, ऋषियों और मुनियों में चेतना की मात्रा – ९ कला

इश्वर के विभिन्न अवतारों में चेतना की मात्रा ९ कलाओं से अधिक होती है . जैसे भगवान् की राम अवतार में १२ कलाए थी. मनुष्य के अन्दर ही यह सामर्थ्य होती है कि अपनी अपूर्णता को सम्पूर्ण कर सके किन्तु प्रकृति के अन्य अभिव्यक्त रूपों में यह सामर्थ्य नहीं होती. इसलिए मनुष्य जीवन का सदुपयोग अत्यंत आवश्यक है.
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अध्यात्मिक उर्जा का क्षय कैसे हो जाता है

मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या ही यह है की वह उर्जा के नियमो से अवगत नहीं है. अध्यात्मिक शक्ति अर्थात  उर्जा का, मंत्र इत्यादि क्रियाओं से आहवाहन तो हो सकता है किन्तु दिव्य उर्जा को संचित कर उसका उचित समय पर उचित प्रयोग करना नही आता है.

इसके अलावा मनुष्य को इस बात का भी ज्ञान नहीं होता है ​कि ​ किस प्रकार ​​छो​टे ​​छो​टे नकारात्मक कर्मों द्वारा अपनी ​कठिनता से प्राप्त दिव्य उर्जा का नु​कसान ​ कर देता है.


उर्जा के क्षय ​का ​ सबसे प्रमुख कारण मन के सभी ​छो​टे और बड़े नकारात्मक विचार होते है. मन की किसी भी वस्तु , व्यक्ति अथवा परिस्थिति को लेकर सबसे पहली ​जो​ प्रतिक्रिया हो​ती ​ है वह है – विचार. विचारो की प्रवृत्ति या तो भूतकाल की​ ओर ​ रहती है या भविष्य की ​ओर ​ रहती है. अधिकंशतः विचार भूतकाल मे हो चुकी घटना मे संलग्न व्यक्ति अथवा वस्तुओं से हमारा भावनात्मक लगाव होने के कारण चलते रहते है. ऐसे विचारो मे अधिकांशतः विचार तुल​​नात्मक , निषेधात्मक और ​अपेक्षात्मक​ हो​ते ​ है जो ​कि ​ मानव मन को असहज बना देते है. भविष्य की आवश्यकता से अधिक चिन्ता भी मन को असंतुलित कर देती है.

भूतकाल और भविष्य काल में रहने से हो रहे शारीरिक और मानसिक  असंतुलन का कारण यह है कि वह शक्ति जो भविष्य का उचित ​निर्माण कर​ सकती ​ है और भूतकाल की असहज परिस्थितियों को पुनः उत्पन्न नहीं होने देती वर्तमान काल मे विद्यमान होती है . किन्तु मनुष्य कभी भी वर्तमान मे सहज हो कर नहीं रहता. वर्तमान का सही उपयोग ना कर पाने के कारण भविष्य ​की​ नयी शुभ सम्भावनाये स्वरूप नहीं ले पाती है. भूतकाल का कोई अस्तित्व नहीं होता है, किन्तु नकारात्मक विचारों द्वारा ​बार बार पोषित होने के कारण ​वह​ भविष्य ​में​ उसी प्रकार के व्यक्तियों से सम्बन्ध अथवा परिस्थित्यों के ​​​​​​निर्माण की सम्भावना को सबल बनाते है.

विचार अध्यात्मिक उर्जा को ​गति​ प्रदान करते है.         
  सका​रा​त्मक उर्जा समय रहते सही दिशा देने पर उत्तम आतंरिक और वाह्य परिस्थितियों का ​​निर्माण कर ​सकती​ है. किन्तु​ यदि​ ​अवांछनीय विचारो पर नियन्त्रण नहीं रखा जाये तो उर्जा का अनुकूल परिस्थितियों के ​​निर्माण​ ​के लिये उपयुक्त मा​त्रा ​ मे संचयन नहीं हो पाता है और सब कु​छ यथावत नकारात्मक रूप मे चलता रहता है.

​​जैसे कि हम सभी ​जा​नते है कि उर्जा का हस्तान्तरण पाँच विधियों के द्वारा होता है – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध उर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान अथवा व्यक्ति तक पहु​चा​ने के वाहक होते है. कटु , तीखे, क्रोधी, निन्दक और व्यंगात्मक शब्दों का यदि प्रयोग किया जाये तो उर्जा की हानि होती है. यही कारण है कि साधनकाल मे तथा अन्य समय मे भी किसी भी प्रकार से प्रेरित होकर अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये. किसी को अशीर्वाद दिया जाये अथवा श्राप ; दोनों ही स्थिति मे स्वयम की तपस्या से अर्जित की गयी उर्जा शब्दों के माध्यम से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित हो जाती है और उस समय की गयी इच्छा के अनुरूप दुसरे व्यक्ति को फल देती है .
तामसिक भोजन, मांस, मदिरा, धूम्रपान इत्यादी का उपयोग भी अध्यात्मिक शक्ति के ​ह्रास​ का प्रमुख ​कारण है.​ऐसा भोजन ​जब तक सम्पूर्णतः शरीर को अपने प्रभाव से मुक्त नहीं कर देता उर्जा स्तर को प्रभवित करता रहता है. ​ता​मसिक भोजन के ​उपरान्त उर्जा को व्यवस्थित होने मे 2-4 दिन सााधरणतयः ​ लग जाते है.

इसी प्रकार जब नकारात्मक विचार​धारा ​​ के साथ जब भोजन बनाया जाता है तो स्पर्श के साथ विचारों की उर्जा पदार्थों मे प्रवेश कर उसकी सात्विक शक्ति को कम कर देते है. नकारात्मक व्यक्तियों के साथ हाथ मिलाने , उनके द्वारा दिए हुए वस्त्र पहनना अथवा उनके वस्त्र पहनने  से भी उनकी ऊर्जा दूसरे व्यक्ति के अंदर प्रवेश कर अस्थिरता , बेचैनी और क्रोध जैसे अन्य विकार उत्पन्न  करते है।  सड़न इत्यादि से पैदा हुई और अन्य अप्रिय लग्ने वाली गंध वायु के माध्यम से नासिका से होती हुई सीधे सूक्ष्म​ शरीर को प्रभवित करती है और उर्जा भौतिक एवम सूक्ष्म शरीर के मध्य उर्जा मे असंतुलन पैदा करती है.

इन्ही सब ​कारणों से अध्यात्म​​ मे मन की शुद्धता , भोजन , वाणी और स्पर्श इत्यादि की सावधानी पर बहुत अधिक बल दिया गया है. य​दि ​ इन माध्यमो का सही उपयोग किया ​जाता​ है तो सकारात्मक उर्जा की ​गति ​अंदर की ​ओर होती है जि​ससे ​ उसका संचय होकर मात्रा मे वृद्धी होती है. इन माध्य​मों ​ का ​​ दुरूपयोग ​करने पर उर्जा की ​प्रवृत्ति ​ वाह्य और अधोमुखी हो जाती है जिससे संचित उर्जा का भी क्षय हो जाता है. य​ह ​ वाह्य ​प्रवृत्ति और अधोगामी ​गति तब तक रहती है जब तक सही प्रयासो और संकल्प के​ ​द्वारा उर्जा का मार्ग परिवर्तित ना किया जाये.
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ऊर्जा का हस्तांतरण

ऊर्जा के आवागमन के सिद्धांत को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर सहजता से समझा जा सकता है  –

* दो रूपों में होता है – सकारात्मक और नकारात्मक
* दो लोगों के मध्य होता है – उच्च केंद्र में स्थित व्यक्ति से निम्न केंद्र में स्थित व्यक्ति को और निम्न केंद्र में स्थित व्यक्ति से उच्च केंद्र में स्थित व्यक्ति को

* दो प्रकार से होता है – ज्ञात अवस्था में और अज्ञात अवस्था में
* दो लोग  महत्वपूर्ण है – देने वाले की क्षमता , ग्रहण करने की क्षमता
* दो कारक जो उर्जा हन्तानान्तरण को प्रभावित करते है – कर्म , विश्वास

ऊर्जा के हस्तान्तरण के लिए ज्ञान और इश्वर की कृपा होना आवश्यक है. उदाहरण के लिए बिना जाने विदुत के तार को सीधे पकड़ लिया जाये तो व्यक्ति को करेंट लग कर करंट की क्षमता के अनुसार शारीरिक नुकसान होता है. विद्युतीय करंट उदासीन है , उसका कर्म है केवल – बहना। इसलिए जो भी व्यक्ति करंट का प्रयोग करना चाहता है , यह उसका उत्तरदायित्व होता है कि उसके सम्बन्ध में पहले पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली जाए।  उसी प्रकार बिना सही प्रकार से आध्यात्मिक शक्तियों के संचय,उपयोग और हस्तानांतरण का ज्ञान सही प्रकार से ना हो तो इस प्रक्रिया में लिप्त व्यक्ति को हानि पहुच सकती है. यह हानि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक किसी भी रूप में हो सकती है. किस प्रकार की और कितनी मात्रा में हानि होगी, यह उपयोग में आ रही ऊर्जा के प्रकार, मात्रा और कार्य के उद्देश्य पर निर्भर करता है. यदि उद्देश्य सकारात्मक और आध्यात्मिक हो तो नुकसान थोड़ा कम होता  है.

सकारात्मक ऊर्जा  हस्तानान्तरण किसी समस्या के समाधान जैसे  रोग निवारण, ग्रह शान्ति जैसे अन्य कार्य और आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु द्वारा शिष्य के लिए किया जाता है।  नकारात्मक ऊर्जा का हस्तानान्तरण अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए किया जाता है. जैसे संपत्ति की प्राप्ति के लिए किसी के दिमाग को बंद कर देना या किसी को अपनी नकारात्मक सोच के अनुसार चलाने के लिए किसी की बुद्धि  भ्रमित करना।

ऊर्जा चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक, इसका हस्तानान्तरण अवश्य होता है।  अधिकांशतः लोगों में ऊर्जा का हस्तानान्तरण बिना उनके अनुभव के स्वतः होता रहता है।  वाणी , विचार , स्पर्श , श्रवण , गंध इत्यादि  के माध्यम से निरंतर ऊर्जा एक  व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के ऊर्जा स्तर को प्रभावित करती रहती है।  जब प्रभावित होने वाली ऊर्जा की मात्रा अधिक हो  जाती है तो इसका अनुभव हमें होने लगता है।  जैसे कोई व्यक्ति जिसके व्यक्तित्व में आंतरिक नकारात्मकता अधिक है  किन्तु वाह्य  व्यवहार शालीन है ऐसे व्यक्ति से वार्तालाप के उपरान्त बेचैनी या चिड़चिड़ाहट का अनुभव होना।  साधु संतो अथवा सत्संग के उपरान्त सकारात्मक ऊर्जा के कारण शांति का अनुभव होना।  ज्ञान ना होने की स्थिति में  चिड़चिड़ाहट अथवा बेचैनी का कारण समझ नहीं पाते है और हमारा व्यवहार परिवर्तित हो जाता है।  हमारा व्यवहार नकारात्मक होकर अन्य लोगों में नकारात्मक ऊर्जा का प्रसार कर देता है।  छोटे बच्चों में ऊर्जा का परिवहन शीघ्र होता है और वह नकारात्मक ऊर्जा के लिए अधिक संवेदनशील होते है।  यही कारण है कि बच्चों को नजर  अधिक लगती है।   नजर के कारण बच्चे अधिक जिद करने लग जाते है जाते है अथवा खाना पीना छोड़ देते है।

ज्ञात अवस्था में ऊर्जा का हस्तानान्तरण केवल श्रेष्ठ जनों द्वारा ही संभव है।  जब एक सिद्ध गुरु, जिसने  के सभी संचित और प्रारब्ध कर्मों के फलों को समाप्त कर लिया  है और प्राणियों के  कल्याण के लिए परम चेतना से जुड़ कर ऊर्जा का स्थानांतरण करता है तो उसका परिणाम अत्यंत शुभ होता है।  अन्य लोग यदि केवल किताबों द्वारा ऊर्जा के संयमन का ज्ञान प्राप्त कर भी ले किन्तु परिणाम लाना संभव नहीं होता।

आध्यात्मिक उर्जा का क्षय

दो व्यक्तियों के मध्य सकारात्मक ऊर्जा का आदान प्रदान हो यह आवश्यक नहीं. इसका अर्थ यह है कि नकारात्मक ऊर्जा किसी दुसरे व्यक्ति से सात्विक व्यक्ति को बिना किसी चेतावनी के शांत रूप में प्रवेश कभी भी कर सकती है.

सात्विक / आध्यात्मिक व्यक्ति की ऊर्जा की प्रकृति और कार्यशैली, संसार में लिप्त व्यक्तियों से अलग होती है. सात्विक व्यक्तियों और  साधना के आरम्भ में यह उर्जा अत्याधिक कोमल और ग्रहणशील होती है, फलस्वरूप किसी भी प्रकार की नकारात्मकता उसको आसानी से क्षतिग्रस्त कर देती है. साधक के द्वारा किसी भी प्रकार के कटु वचन का प्रयोग, नकारात्मक विचार, खाने पीने में असावधानी और स्थान आदि की अशुद्धता उन्ही को अधिक प्रभावित कर देती है.
इसके विपरीत नकारात्मक ऊर्जा की आवृत्ति कम होती है और सहजता के साथ प्रवेश कर अपना विस्तार शीघ्र कर स्थायी रूप ले लेती है जिसके कारण इसका विस्थापन और रूपांतरण आसान नहीं होता है.
कई बार ऊर्जा का प्रवाह उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर बिना किसी विशेष क्रिया के उसी प्रकार हो जाता है जिस प्रकार पानी ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर प्रवाहित हो जाता है.

प्राण शक्ति अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील होती है. इसको प्रभावित करने वाले बहुत सारे कारक है जैसे स्पर्श रस रूप गंध शब्द इत्यादि किन्तु यह सबसे ज्यादा प्रभावित मानसिक स्थिति से होती है. उदाहरण के लिए कोई कितना भी सुन्दर क्यों ना हो यदि विचार अच्छे नहीं होंगे तो ऐसे व्यक्ति का स्पर्श नकारात्मक ऊर्जा का ही प्रसार करेगा. यदि भोजन बनाते समय मन की स्थिति शुभ नहीं हो तो भोजन की सात्विक शक्ति कम हो जाती है.

ऐक व्यक्ति जिसने दिन भर मन में नकारात्मक घटनाओं, व्यक्तियों अथवा वस्तुओं का चिंतन किया है , वह पास आ कर कुछ ना भी कहे किन्तु फिर भी सात्विक ऊर्जा प्रभावित हो जाती है . ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बार बार एक ही विचार की पुनरावृत्ति होने के कारण नकारात्मक उर्जा प्रबल हो जाती है और सकारात्मक व्यक्ति ग्रहणशील होने के कारण बिना स्पर्श शब्द और दृष्टिपात से प्रभावित हो जाता है.

इसका कारण यह है कि विचारों की आवृत्ति अन्य सब माध्यमों से बहुत अधिक तीव्र होती है जिसके कारण इसका प्रभाव भी शीघ्र प्रभावित करने वाला होता है. यही कारण है आध्यात्मिक मार्ग में विचारों के शुद्धिकरण पर बहुत अधिक बल दिया गया है .

आध्यात्मिक उर्जा का क्षय

दो व्यक्तियों के मध्य सकारात्मक ऊर्जा का आदान प्रदान हो यह आवश्यक नहीं. इसका अर्थ यह है कि नकारात्मक ऊर्जा किसी दुसरे व्यक्ति से सात्विक व्यक्ति को बिना किसी चेतावनी के शांत रूप में प्रवेश कभी भी कर सकती है.

सात्विक / आध्यात्मिक व्यक्ति की ऊर्जा की प्रकृति और कार्यशैली, संसार में लिप्त व्यक्तियों से अलग होती है. सात्विक व्यक्तियों और  साधना के आरम्भ में यह उर्जा अत्याधिक कोमल और ग्रहणशील होती है, फलस्वरूप किसी भी प्रकार की नकारात्मकता उसको आसानी से क्षतिग्रस्त कर देती है. साधक के द्वारा किसी भी प्रकार के कटु वचन का प्रयोग, नकारात्मक विचार, खाने पीने में असावधानी और स्थान आदि की अशुद्धता उन्ही को अधिक प्रभावित कर देती है.
इसके विपरीत नकारात्मक ऊर्जा की आवृत्ति कम होती है और सहजता के साथ प्रवेश कर अपना विस्तार शीघ्र कर स्थायी रूप ले लेती है जिसके कारण इसका विस्थापन और रूपांतरण आसान नहीं होता है.
कई बार ऊर्जा का प्रवाह उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर बिना किसी विशेष क्रिया के उसी प्रकार हो जाता है जिस प्रकार पानी ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर प्रवाहित हो जाता है.

प्राण शक्ति अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील होती है. इसको प्रभावित करने वाले बहुत सारे कारक है जैसे स्पर्श रस रूप गंध शब्द इत्यादि किन्तु यह सबसे ज्यादा प्रभावित मानसिक स्थिति से होती है. उदाहरण के लिए कोई कितना भी सुन्दर क्यों ना हो यदि विचार अच्छे नहीं होंगे तो ऐसे व्यक्ति का स्पर्श नकारात्मक ऊर्जा का ही प्रसार करेगा. यदि भोजन बनाते समय मन की स्थिति शुभ नहीं हो तो भोजन की सात्विक शक्ति कम हो जाती है.

ऐक व्यक्ति जिसने दिन भर मन में नकारात्मक घटनाओं, व्यक्तियों अथवा वस्तुओं का चिंतन किया है , वह पास आ कर कुछ ना भी कहे किन्तु फिर भी सात्विक ऊर्जा प्रभावित हो जाती है . ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बार बार एक ही विचार की पुनरावृत्ति होने के कारण नकारात्मक उर्जा प्रबल हो जाती है और सकारात्मक व्यक्ति ग्रहणशील होने के कारण बिना स्पर्श शब्द और दृष्टिपात से प्रभावित हो जाता है.

इसका कारण यह है कि विचारों की आवृत्ति अन्य सब माध्यमों से बहुत अधिक तीव्र होती है जिसके कारण इसका प्रभाव भी शीघ्र प्रभावित करने वाला होता है. यही कारण है आध्यात्मिक मार्ग में विचारों के शुद्धिकरण पर बहुत अधिक बल दिया गया है .
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ग्रहणशीलता का अर्थ

जब इश्वर की चेतना अर्थात शक्ति कण कण में विद्यमान है तो क्या कारण है कि हम उस ऊर्जा को ग्रहण नहीं कर पाते है. इसका मुख्य कारण है जाग्रति का अभाव. इस अभाव के कारण हम ऊर्जा के परम स्रोत को अपने अन्दर समाहित नहीं कर पाते है.

जाग्रति का अभाव अर्थात अज्ञानता का कारण है हमारे ज्ञान, कर्म और भक्ति के मध्य सही समन्वय का ना होना. जब इन तीनों के मध्य समन्वय नहीं होता है तो हमारी अशुद्धियाँ बढती जाती है. कभी ज्ञान के अधूरेपन के कारण कर्म सही नहीं होता और कभी भक्ति की कमी के कारण ज्ञान और कर्म दूषित हो जाते है. इस प्रकार यह चक्र निरंतर चलता रहता है और आत्मा के ऊपर अज्ञान का आवरण गहरा होता जाता है. हमारी अशुद्धियाँ ही हमें परम सत्य से दूर रखती है . एक सम्पूर्ण गुरु इन अशुद्धियों को भली प्रकार से समझता है और शिष्य को उनका विभिन्न माध्यमों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करा कर उनको दूर करने में शिष्य की पूर्ण सहायता करता है. अशुद्धियों को दूर करने के लिये शिष्य का उत्तरदायित्त्व निरंतर ग्रहणशील हो कर चलते रहने का है. आध्यात्मिक ज्ञान केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं रहता . जब तक ज्ञान को जीवन में उतारा ना जाये तब तक वह पुर्णतः समझ नहीं आता. अपनी प्रारंभिक बुद्धि से हमको जितना भी समझ आता है वह हमको धैर्य प्रदान करता है और हमारे कर्म को सही दिशा देकर भक्ति को दृढ करती है.

ग्रहणशील होने का अर्थ है – अपनी मान्यताओं , विचारधाराओ और स्वयं के सही एवं श्रेष्ठ होने की भावना को अपने ऊपर प्रभावी नहीं होने देना और गुरु द्वारा दिखाए गए मार्ग पर शरीर, मन और आत्मा की सम्पूर्ण शक्ति लगाकर निरंतर चलने का प्रयास करना. जब शिष्य अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ प्रयास करता है तो पूर्व जन्म के नकारात्मक कर्मों की उर्जा का रूपांतरण होने लगता है. इस रूपांतरण के कारण बुद्धि पर पड़ा हुआ आवरण हटने लगता है और जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण एवं नयी सामर्थ्य का जन्म होता है. रूपांतरण की यह प्रक्रिया सहज नहीं होती है. इसमें कई बाधाओं और पीडाओं का सामना करना पड़ता है जिससे पार केवल गुरु पर विश्वास और कर्मठ हो कर कर्म करने से जाया जा सकता है.
जब शिष्य अपने प्रयासों और सीमाओं से थक जाता है तो गुरु अपने ज्ञान, कर्म और भक्ति की शक्ति से शिष्य को संभालता है और सीमा से परे ले जाता है.
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ऊर्जा देने की क्षमता

किसी अन्य व्यक्ति को ऊर्जा देने के लिए निम्नलिखित बिदु अत्यंत महत्वपूर्ण है –

प्रथम – ऊर्जा देने वाले व्यक्ति का परम चेतना के साथ सम्बन्ध
द्वितीय – ऊर्जा के आह्वाहन और हस्तानान्तरण के समय मन की स्थिति
तृतीय – काल / समय की अनुकूलता
चतुर्थ – ऊर्जा देने वाले का ज्ञान, अनुभव और कौशल
पंचम – देने वाले और ग्रहण करने वाले व्यक्ति के मध्य सम्बन्ध
षष्ठ – स्थान , मन और कर्म के कारण दोनों के मध्य अंतर / दूरी

ऊर्जा देने वाले व्यक्ति का, परम चेतना के साथ सम्बन्ध जितना गहरा होता है उतनी ही अधिक उसकी क्षमता होती है और ऊर्जा की गुणवत्ता एवं प्रभाव उतना ही अधिक होता है. व्यक्ति जितना अधिक मन और बुद्धि को शुद्ध करता है, इश्वर के साथ सम्बन्ध उतना ही घनिष्ठ होता जाता है.

ऊर्जा के आह्वाहन और किसी व्यक्ति को हस्तानान्तरण करने के लिए मन का स्थिर और एकाग्र होना अत्यंत आवश्यक है. इसी अवस्था में ईश्वरीय शक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित हो सकता है.

कुछ विशेष तिथियाँ होती है जैसे नवरात्रे इत्यादि, जिनमे ऊर्जा की मात्रा प्रकृति में प्रचुर मात्रा में विद्यमान होती है जिसके कारण उनका आह्वाहन सहज हो जाता है. इन तिथियों में मन एवं शरीर भी उसको ग्रहण करने योग्य अधिक होता है.

ऊर्जा को किसी अन्य व्यक्ति को देने के लिए ऊर्जा को उसके योग्य बनाना होता है क्योकि जो व्यक्ति शरीर और मन से ऊर्जा के लिए तैयार नहीं होता है उसके लिए ऊर्जा का ग्रहण करना सहज नहीं होता है इसलिए जो व्यक्ति ऊर्जा दे रहा है उसको ग्रहण करने वाले व्यक्ति की प्रकृति, प्राकृतिक क्षमता और आध्यात्मिक स्तर का ज्ञान होना आवश्यक है जिसके आधार पर ही यह निर्धारित होता है कि किसको कितनी मात्रा में, किस प्रकार की ऊर्जा, किस समय दी जाए जिससे वह ग्रहण करने वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सके.

ऊर्जा देने वाले और ग्रहण करने वाले व्यक्ति के मध्य सम्बन्ध होना अनिवार्य है. यह सम्बन्ध इस प्रकार का हो सकता है जैसे – शिक्षक और छात्र का, रोगी और वैद्य का, संस्था प्रमुख और कर्मचारी. सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक सम्बन्ध गुरु और शिष्य का होता है. दीक्षा की प्रक्रिया इस सम्बन्ध को दृढ़ता प्रदान करती है. बिना किसी सम्बन्ध के ऊर्जा को संकेंद्रित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

स्थान के कारण दूरी अधिक हो तो ऊर्जा के परिवहन के लिए अधिक समय और मात्रा की आवश्यकता होती है. ऊर्जा को ग्रहण करने वाला व्यक्ति यदि मानसिक रूप से तैयार ना हो तो ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है. कठिन कर्मों के कारण भी ऊर्जा की ग्रहण शीलता कम हो जाती है.
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नकारात्मक स्थिति से कैसे निपटें

सकारात्मक व्यक्तियों पर नकारात्मक ऊर्जा अर्थात तमो गुण का प्रभाव कभी कभी अधिक  हो जाता है. तमो गुण के प्रभाव  कारण वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा में स्वयं ही बाधा उत्पन्न  कर लेते है और वर्तमान ऊर्जा के स्तर से नीचे गिर जाते है. एक साधक को यह ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक कि किन परिस्थितियों में तमो गुण ( नकारात्मक सोच और व्यवहार) हमारे ऊपर हावी होकर सत्व गुण अर्थात ज्ञान, विश्वास और सकारात्मक कर्म को निर्बल बना देता है.

हम सभी में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की विभिन्न मात्राएँ विभिन्न रूपों में विद्यमान होती है. इसका विभाजन ऋषि मुनियों ने तीन विभागों में किया है – सत्व , रज और तम।  सत्व गुण प्रधान व्यक्ति में काम क्रोध इत्यादि की मात्रा रज और तम गुण प्रधान व्यक्तियों की तुलना में कम अवश्य होती है किन्तु इससे मुक्त नहीं होते. मात्रा कम होने कारण इन विकारों का प्रदर्शन कभी कभी होता है  उसका स्वरुप भी भिन्न होता है।  तमो गुण वाले व्यक्ति में ये विकार अधिक आक्रामक स्वरुप में होते है और वह उसमें दूसरों को उपद्रव कर कर के बुरी तरह परेशान कर देते है. इसके विपरीत सत्व गुण वाले व्यक्तियों पर जब तमो गुण हावी होता है तो वह स्वयं को ही अधिक कष्ट देते है. उनके विचार इस प्रकार आते है – मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ , मैं  सबके साथ अच्छा हूँ पर मेरे साथ अच्छा नहीं होता, मेरी भूल नहीं पर मै ही कष्ट में हूँ, लोग गलत कर के खुश है, मेरा परिवार  मेरी इच्छाओं एवं भावनाओं का सम्मान नहीं करता, मेरी बातों पर  नही दे रहा, जो वचन दिया उसको पूरा नहीं किया जा रहा, मै इतने समझौतों के साथ जीवन जी रहा हू पर इस बात को कोई महत्व नहीं दे रहा इत्यादि इत्यादि।

इस प्रकार के विचार जब आते हैं तो सात्विक व्यक्ति विकारों को अपने अंदर प्रवेश करने का अवसर दे देते हैं। इन विकारों की विशेषता यह होती है कि ये प्रवेश करते साथ ही बहुत तीव्रता के साथ अपना विस्तार कर सत्व गुण की शक्ति को कम कर देते है. इस कारण व्यक्ति अपनी शांति और संयम की स्थिति से गिर कर अस्थिर और असंयमित हो जाता है।  ऐसे विचार जिनका कोई अर्थ नहीं, मन को आंदोलित करने लगते है।  अशांत मन के कारण कर्म की गति और दिशा दोनों बदल जाती है जिसके कारण समय और  आध्यात्मिक ऊर्जा का बहुत अधिक मात्रा में नुकसान हो जाता है।

ऐसी स्थितियों का सामना साधक को जीवन में बार बार करना पड़ता है. इसलिए प्रश्न यह है कि इस प्रकार की बाधाओं से कैसे बचा जाये ? इसका  समाधान अत्यंत सहज है. काम क्रोध मोह इत्यादि तभी सक्रिय हो कर प्रवेश कर सकते है जब इनके बारे में ध्यान दिया जाए और अपनी धारणा के अनुरूप विश्लेषण कर उस पर सही या गलत का निर्णय दिया जाये . उदाहरण के लिए सास यदि बहू की बुराई करे , बहु उसको सुन कर अंदर ही अंदर बार बार उन बातों को सोचने लगे और नकारात्मक बातों से प्रभावित हो कर दुखी होना प्रारम्भ कर दे तो कुछ पल की बाते मन के अंदर अत्यंत कटुता पैदा कर व्यवहार को परिवर्तित कर देता है. यह कटुता , और पुरानी व्यर्थ की बातों को सतह पर ले आती है. जिसके कारण कटुता  बढ़ जाती है और मन सत्व गुण से हट जाता है. सत्व गुण  के कमजोर हो जाने के कारण मन  अस्थिर हो कर अन्य उलटे सीधे विचारों को जन्म देकर शरीर और मन दोनों को अत्यंत थका देता है. बहु या अन्य किसी भी व्यक्ति के ऐसी परिस्थितियों से प्रभावित हो जाने का कारण अहंकार और प्रतिष्ठा / प्रशंसा का मोह होता है.

जब कोई हमारी निंदा करता है या हमसे असहमत होता है तो अहंकार के कारण हम स्वयं को  निंदक  बातो अर्थात शब्द रुपी नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ लेते है. यह बात मन में अवश्य आती है कि हमारे बारे में ऐसी बात क्यों की? फिर इस पर विश्लेषण कर नकारात्मक ऊर्जा को फलने फूलने का मौका देते है और फिर एक धारणा बना कर उसको सशक्त कर देते है. इसके विपरीत यदि निंदा को बिना ध्यान दिए और  विश्लेषण किये हुए वही छोड़ देते है और नियति को स्वीकार कर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहते है तो नकारात्मक ऊर्जा हमारे अंदर प्रवेश नहीं कर पाती है जिसके कारण उसकी वृद्धि नहीं हो पाती है और शीघ्र ही समाप्त हो जाती है. इस के कारण समय एवं सत्व गुण की हानि ना होने के कारण  शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते है.
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विज्ञान भैरव तंत्र के सूत्र

माता पार्वती के यह प्रश्न पूछने पर की ” ईश्वर कौन है” और “क्या है ?” भगवन शंकर उन्हें सीधे उत्तर न देके निम्नलिखित विधियां बताते है, जोकि ११२ है। किसी न किसी रूप में, सभी ग्रन्थ, धर्मो में इन्ही ११२ विधियों का प्रयोग है । मन के रूपांतरण की श्रेष्ठ विधियों को मानव मात्र के कल्याण के लिए भगवान् शिव ने माता पार्वती के माध्यम से प्रकाशित किया . इन विधियों के माध्यम से पुराने कर्मों की सीमाओं के बंधन को शिथिल किया जा सकता है. इन विधियों के महत्त्व को जानने के लिए बुद्धि के प्रयोग की अपेक्षा अभ्यास अधिक महत्वपूर्ण है . इसका कारण यह है कि जब तक बुद्धि को मन से स्वतंत्र नहीं किया जाता वह स्वतंत्र रूप से सही निर्णय नहीं ले सकती. इसलिए माता पार्वती के इश्वर सम्बन्धी प्रश्न पूछने पर प्रभु शिव प्रश्न का सीधे उत्तर ना देकर वह क्रियाएं बताते है, जिनका अभ्यास कर इश्वर को अनुभव किया जा सकता है.

तंत्र हमारे अस्तित्व से जुड़ी हर चीज का उपयोग कर उससे पार होने में सहायता करता है चाहे वह  कामना, भय, क्रोध , नींद, कल्पना , श्वास अथवा छींक जैसी शारीरिक क्रिया ही क्यों ना हो . और हर भावना अथवा क्रिया में महत्वपूर्ण है सजग रहना . सजगता ही चेतना की गहराई को नापने का महत्वपूर्ण साधन है. जब यह साधन साध जाता है तो आत्म ज्ञान स्वयं प्रकाशित हो जाता है . जागृति के लिए महायोगी शिव द्वारा कथित ११२ विधियां इस प्रकार है :-

१) दो श्वासो के मध्य ध्यान केंद्रित करे। श्वासो की अंदर जाती और बाहर आती प्रकिया को सजगरूप से देखे।
२) जब श्वास नीचे से ऊपर की ओर जाती है और ऊपर से नीचे की ओर आती है, तो इस संधि काल को देखे।
३) जब अंतः श्वास और वाह्य श्वास एक दूसरे से मिलते है, उस प्रक्रिया के केंद्र को स्पर्श करे।
४) जब प्रश्वास पूरी तरह बाहर हो या पूरी तरह भीतर हो, उसके मध्य के अंतराल पर ध्यान केंद्रित करे।
५) भ्रकुटी के मध्य स्थान अर्थात आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करे और प्राणऊर्जा को सहस्त्रारचक्र में भरे।
६) सांसारिक कार्य करते हुए , ध्यान को दो श्वासो के मध्य केंद्रित करे।
७) ललाट के मध्य श्वास को स्थिर करे। इस अभ्यास से प्राणऊर्जा हृदय में पहुंचती है, जिससे स्वयं के स्वप्न और मृत्यु पर अधिकार हो जाता है।
८) पूर्ण भक्तिभाव के साथ दो श्वासो की संधि के समय एकाग्र होकर ज्ञाता को जान लो।
९) ऐसे लेट जाए जैसे मृत हो, क्रुद्ध भाव में स्थिर हो जाये अथवा बिना पलक झपकाए घूरे या कुछ मुँह में लेके चूसे और उस प्रक्रिया मैं विलीन हो जाये।
१०) प्रेम के स्पर्शमय क्षणों में ऐसे प्रवेश करे, जैसे वह नित्यअक्षय हो।
११ )जब चीटियों के रेंगने का अनुभव हो, तो अपने इन्द्रियॉ के द्वार बंद करले। *
१२) जब शय्या पर हो तो मन के पास जाकर भार शून्य हो जाए
१३) मोर पंख के पांच रंग के वरतुल में पांचो इन्द्रियॉ की कल्पना करनी है , और यह भाव करना है कि यह पांचो रंग भीतर किसी बिंदु पर मिल रहे है.
१४) अपने पूरे ध्यान को मेरुदण्ड के मध्य, कमलतन्तु सी इस कोमल स्नायु में स्थित करो और उसमें समा जाओ .
१५) सिर के सात द्वारा को (आँख,कान , नाक और मुख ) आँखों के बीच का स्थान (आज्ञाचक्र) सर्व ग्राही हो जाता है .
१६) जब इंद्रियां हृदय में विलीन हो, तब कमल के केंद्र पर पहुंचो (सहस्त्रार)।
१७) मन को भूल कर मध्य में रहो – जब तक (मन स्थिर न हो जाये).
१८) किसी भी विषय को प्रेम पूर्वक देखे , दूसरे विषय पर मत जाये,विषय के मध्य में – आनंद.
१९) पाँव या हाथ का सहारा लिए बिना नितम्बों पर बैठे- अचानक केंद्रित हो जाएंगे।
२०) किसी चलते वाहन में जब शरीर हिलता है तो लयबद्ध डोलकर अनुभव को प्राप्त हो.
२१) शरीर के किसी भाग को सुई से भेदो, उस पीड़ा में प्रवेश करो और आतंरिक शुद्धता को सिद्ध करो.
२२) अतीत की घटना का स्मरण होते समय चेतना को ऐसी जगह रखे जिससे शरीर को भी साक्षी रख सके और घटना को भी.
२३) अपने सामने किसी विषय का अनुभव करे और अन्य विषयों की अनुपस्थिति को अनुभव करे ,फिर विषय भाव और अनुपस्थिति के भाव को भी छोड़ दे और आत्मा को उपलब्ध हो जाये.
२४) जब किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे, उस व्यक्ति पर आरोपित नहीं करे .
२५) जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो रुक जाये .
२६) जब कोई कामना उठे तो उसको देखो और अचानक उसे छोड़ दो.
२७) तब तक घुमते रहे जब तक पूरी तरह थक ना जाये, फिर जमीन पर गिरकर , गिरने में पूर्णता का अनुभव करे .
२८) शक्ति या ज्ञान से धीरे- धीरे वंचित होने कि कल्पना करे, और वंचित किये जाने के समय में अतिक्रमण करे (दृष्टा बन जाए).
२९) भक्ति मुक्त करती है .
३०) आँखे बंद करके, अपने अंदर अस्तित्व को विस्तार से देखो, इस प्रकार अपने सच्चे अस्तित्व को देख लो.
३१) एक पात्र / कटोरी को उसके किनारों और सामग्री के बिना देखो और आत्मबोध को प्राप्त हो जाओ .
३२) किसी सूंदर व्यक्ति या सामान्य विषय को ऐसे देखो , जैसे उसे पहली बार देख रहे है .
३३ ) बादलों के पास नीले आकाश को देखते हुए शांति और सौम्यता को उपलब्ध हो .
३४) जब परम उपदेश दिया जा रहा हो, अविचल , अपलक आँखों से उसे श्रवण करो और मुक्ति को उपलब्ध हो .
३५) किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी गहराईओं को निरन्तर देखते रहो जबतक विस्मय मुग्ध न हो जाओ .
३६) किसी विषय को देखो फिर धीरे – धीरे उससे अपनी दृष्टि हटा लो और फिर अपने विचार भी उससे हटा लो .
३७) दृष्टि पथ में संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों की कल्पना करो,पहले अक्षरों की भाँती , फिर सूक्ष्मतर ध्वनि की भाति, फिर सूक्ष्मतर भाव की भाति, और फिर उसे छोड़ कर मुक्त हो जाओ .
३८) जलप्रपात की अखण्ड ध्वनि के केंद्र में स्नान करो.
३९) ॐ मंत्र जैसी ध्वनि का मंद मंद उच्चारण करो .
४०) किसी भी वर्ण के शाब्दिक उच्चारण  के आरंभ और क्रमिक परिष्कार के समय जागृत हो .
४१) तार वाले वाद्यों को सुनते हुए, उनकी सयुक्त केंद्रित ध्वनि को सुनो और सर्वव्यापक हो जाओ .
४२) किसी ध्वनि का उच्चारण ऐसे करो कि वह सुनाई दे,फिर उस उच्चारण को मंद स
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दान का अर्थ, प्रकार, निर्धारण, योग्य बातें

दान का शाब्दिक अर्थ है – देना
​ ​
दान के पीछे यह सिद्धांत काम करता है कि जो हम देते है वही हम पाते है ।  सम्पूर्ण प्रकृति इसी सिद्धांत पर काम करती है. वृक्षों का फल और नदियों का जल स्वयं के लिए नहीं होता।   देवता भी वही कहलाता है जिसकी देने की प्रवृत्ति हो और संग्रह की प्रवृत्ति न हो।  ​

दान   के प्रकार –
​ ​अन्न दान , ज्ञान दान , गौ दान , औषधि दान , भूमि दान , कन्या दान ,  फल दान
​, समय दान , क्षमा दान , श्रम दान ​, आशीर्वाद , अंग दान

किसी भी दान की तीन श्रेणियां होती है –
सात्विक दान – जब बिना किसी स्वार्थ के कर्तव्य निर्वहन हेतु दान किया जाता है तो वह सात्विक दान होता है .
राजसिक दान – पापों के प्रायश्चित और अन्य इच्छा पूर्ति के लिये जो दान किया जाता है वह राजसिक दान होता है
 तामसिक दान – अयोग्य व्यक्ति , प्रतिकूल समय और अशुद्ध व्यवहार के साथ दिया हुआ दान तामसिक दान कहलाता है .

 दान के छह मुख्य कारण है  –  
धर्म – पशु पक्षियों को अन्न देना , ऋषियों को जीवन यापन हेतु स्वेच्छा से दान करना , इश्वर की कृपा प्राप्त करने हेतु दान करना 
अर्थ – धन की प्राप्ति और अपनी विशेष इच्छाओं की पूर्ती हेतु दान करना। हेतु दान करना। इसको काम्य  दान भी कहते है।
काम –   स्त्रीगमन, सुरापान, शिकार और जुए के प्रसंग में अनधिकारी मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है।  
लज्जा – किसी की तुलना अथवा प्रतिष्ठा के कारण दान करना 
हर्ष – किसी शुभ समाचार की प्राप्ति के उपरान्त प्रसन्नता के कारण दिया हुआ दान 
भय – निंदा ,पाप , मृत्यु  अथवा अन्य किसी भय के कारण दिया हुआ दान 
ज्योतिष विज्ञान  और  दान –  ज्योतिष विज्ञान असमय किये हुए दान , कुपात्र को दिए हुए दान और अनावश्यक दान को प्रशस्त नहीं करता।  विशेष मुहूर्तों , विशेष व्यक्तियों और विशेष स्थान पर सुयोग्य दान की संस्तुति है।
​जिन खराब कर्मों को संतुलित करना है ​,  ग्रहों के माध्यम से उनका ज्ञान प्राप्त कर केवल  उन्ही का दान करना चाहिए।
दान का निर्धारण तीन  प्रकार से  होता है –
  1. सामर्थ्य
  2. श्रद्धा
  3. आवश्यकता


​दान का विज्ञान –
दान के द्वारा व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के कृत्यों / ऋणों को तटस्थ कर, अंतःकरण की शुद्धि करता है और  ईश्वर की कृपा प्राप्त करने योग्य  बनता है ।
​दान विशेषतः आसक्ति अर्थात मोह और अहंकार पर काम करता है।  ​जब हम दान करते है तो अधिकार की प्रवृत्ति ख़त्म होती है इसके फल स्वरुप मन में सहजता अर्थात खुलापन आता है

दान देते समय ध्यान रखने योग्य बातें – 
दान करते समय दाता को ईर्ष्या क्रोध अहंकार इत्यादि विकारों से दूर रहना चाहिये . मन मे प्रसन्नता और उत्साह होना चाहिये . ईश्वर ने दान करने के योग्य बनाया है और अपनी सेवा करने का अवसर दिया है , इस भाव को रखते हुए प्रेम के साथ दान करना चाहिये .जब भी हम दान करते है तो प्रतिफल की आशा रख कर दान नहीं करना चाहिए।  ​दान सुपात्र को ही देना चाहिए।  दान देने के उपरान्त पश्चाताप की भावना नहीं होनी चाहिए।  बिना विश्वास के दिया हुआ दान भी व्यर्थ हो जाता है।

आज काल अधिकतर लोगो मे दान देने की भावना घट रही है, इस के साथ ही जो संपन्न वा वैभव शाली लोग दान कर रहे है, उन मे से भी अनेक लोगो की भावना दान पर केन्द्रित ना हो कर दान के फल या अपनी तारीफ के लिये होती है, संपन्न लोग सोचते है कि जितना वो दान करेंगे उतना ही सम्मान मिलेगा।  वह  वयक्ति जो निष्पक्ष, निःस्वार्थ और सद्भावना से दान करता है वो ही स्वीकार्य होता है।   जो लोग किसी कामना से दान करते है या कोई स्वार्थ रखते है उनकी केवल कामना ही पूर्ण होती है . ऐसा दान स्वार्थ और पक्षपात की श्रेणी मे आ जाता है ऐसे दान का फल निकृष्ट होता है।

​हर धर्म कहता है वयक्ति को आमदनी का कुछ हिस्सा दान करना चाहिये . दान हमेशा फलता है और वयक्ति सुख, संपत्तिवान बनता है, व्यक्ति को वैभवशाली बनाता है,कुछ ही लोग दान के महत्व को समझते है, इस लिये वो अनगिनत बार बड़ी राशि दान सवरूप दे देते है . दान की भावना हर मनुष्य मे होनी चाहिये . चाहे कम या ज्यादा धन अर्जित करे अपनी भावना अनुसार व हैसियत के अनुसार दान अवश्य करना चाहिये .​ शास्त्र के अनुसार अपनी आय का दसवां हिस्सा दान हमेशा करना चाहिए।  कई समस्याओं का समाधान जाने अनजाने केवल इसी नियम से हो जाता है।
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इष्ट देव की पूजा की आवश्यकता क्यों

इश्वर निर्गुण , अनंत और सर्वव्यापी है , स्थान और समय से परे है किन्तु हमारा मन इन्द्रियों द्वारा सीमित होने के कारण इश्वर की सर्वव्यापकता और अनंतता को स्वीकार नहीं कर पाता है। इस अस्वीकार की स्थिति के कारण निर्गुण स्वरुप मन को स्थिर नहीं कर पाता  है . मन की क्रमिक उन्नति और स्थिरता के लिए इश्वर के सगुण  स्वरुप की अराधना का विधान किया गया है ।   

जब भी हम कोई कर्म करते है तो अधिकांशतः उसके पीछे कोई न कोई इच्छा अवश्य होती है . उस इच्छा पूर्ती के लिए उपयुक्त साधन की आवश्यकता होती है . साधन की सामर्थ्यता और अनुकूलता  व्यक्ति की सामर्थ्य को बढ़ा देती है।  इस बात को इस उदाहरण से समझे जैसे किसी भी यात्रा की सम्पूर्णता में लगने वाला  समय प्रयोग किये जाने वाले साधन पर निर्भर करता है।  यात्रा की सम्पूर्णता के लिये दूसरा पक्ष यह है की व्यक्ति / यात्री की सामर्थ्य भी अच्छी होनी चाहिए ।  एक ही यात्रा अलग अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग समय पर पूरी होती है . व्यक्ति शारीरिक रूप से कितना भी सामर्थ्यवान हो यदि वह यात्रा पैदल अथवा साईकिल से करे तो यात्रा का समय अधिक लगेगा . इसमें यदि साधक की सामर्थ्य कम हो तो यात्रा का समय और बढ़ जायेगा क्योंकि विश्राम की आवश्यकता अधिक पड़ेगी. यही यात्रा यदि कार अथवा हवाई जहाज से की जाये तो यात्रा का समय और भी कम किया जा सकता है, किन्तु इस अवस्था में आर्थिक सम्पन्नता की आवश्यकता पड़ती है . जैसे व्यवहार जगत में जीवन यापन के लिए नियमों की आवश्यकता होती है और हर नियम की अपनी कुछ सीमायें होती है , उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत के कुछ नियम होते है और उन नियमों की अपनी सीमाए होती है .

 साधारणतः सभी व्यक्ति यह समझते है कि हम किसी भी स्वरुप की अराधना कर सकते है किन्तु यहाँ पर यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इश्वर ने विभिन्न स्वरुप क्यों धारण किये ? यदि रूप धारण ही करना था तो एक स्वरुप से भी काम चल सकता था .इश्वर के विभिन्न रूप उस सर्वशक्तिमान इश्वर के विभिन्न गुणों और कार्यों का निर्धारण करते है . जैसे विद्या की प्राप्ति के लिए सरस्वती जी , विघ्नों को दूर करने के लिए गणपति जी और धन की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी जी की अराधना की जाती है।  क्योंकि उस विशेष स्वरुप में एक विशेष गुण के ऊर्जा की मात्रा अधिक होती है जिससे वह विशेष इच्छा पूर्ती शीघ्र होती है।  किन्तु इस का अर्थ यह नहीं होता कि सभी स्वरूपों की अराधना एक साथ कर ली जाये।  यदि किसी व्यक्ति के पास दस शयनकक्ष हो किन्तु वह सभी शयनकक्षों में एक साथ नहीं सो सकता। इसी प्रकार सभी स्वरूपों की अराधना एक साथ नहीं की जा सकती।  इष्ट देव इश्वर के उसी स्वरुप को बनाया जाता है जो जीव की ऊर्जा स्तर  के अनुकूल हो और उसके सबसे निकट हो।  इष्ट देवता ही कुण्डलिनी शक्ति अथवा आत्म ज्ञान के जागरण के लिए  प्रथम द्वार होते है . यदि प्रथम द्वार ही बंद हो तो दिव्य चेतना उर्जा  का प्रवाह सही नहीं हो पाता है .

हिन्दू पद्धति में मुख्यतः पांच इष्ट देवता सांसारिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए बताये गए है – सूर्य देव , शक्ति आराधना (दुर्गा , लक्ष्मी , सरस्वती) , भगवान् विष्णु और उनके अन्य अवतार और भगवान् शिव . दक्षिण भारत में  कार्तिकेय भगवान् को इष्ट देवता का स्थान दिया गया है . निम्नलिखित देव ग्रहों के अधिपति है – t

• सूर्य —विष्णु , रमा, शिव
• चन्द्र —कृष्ण, शिवा, पार्वती
• मंगल – हनुमान , श्री नरसिम्हा, दुर्गा 
• बुध — विष्णु
• गुरु — विष्णु, श्री वामन, दत्तात्रेय
• शुक्र – महा लक्ष्मी, परशुराम , माँ गौरी
• शनि – हनुमान, कूर्मा, शिव, विष्णु
• राहु – माँ दुर्गा
• केतु – गणेश , मतस्य

ग्रहों के माध्यम से व्यक्ति की उर्जा का स्तर और अनुकूलता का निर्धारण कर इष्ट का निर्धारण किया जाता है।  ग्रह अत्यंत महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है उस अनन्त को पाने के लिए ।  एक जागृत और सिद्ध गुरु शिष्य के शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक स्तर को ग्रहों के माध्यम से ज्ञात कर विभिन्न स्तरों को संतुलन करने हेतु उपयुक्त इष्ट देव और मंत्र का चुनाव करता है।  जब  सही  इष्ट की आराधना और सही मंत्र का निरंतर जाप किया जाता है तो शरीर , मन और आत्मा के मध्य  नकारात्मक कर्मों की बाधाएं हटने लगती है और परम चेतना से संपर्क  स्थापित होने लगता है।
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वैराग्य जीवन

वैराग्य अर्थात्‌ न ‘वैर’ हो न ‘राग’ हो। विषयों के साथ रहते हुए भी मन का उनसे लिप्त ना होना ही वैराग्य है.

वैराग्य निम्नलिखित कारणों से होता है –

* भय के कारण उत्पन्न वैराग्य – नरक के भय से संसार के विषयों से दूर हो जाने वाला वैराग्य
* विचार के कारण उत्पन्न वैराग्य – जो सत्संग और गुरु की कृपा के कारण उत्पन्न सत्य और असत्य के विवेक द्वारा संसार के विषयों से अलग होता है
* साधन के कारण उत्पन्न वैराग्य – जब मनुष्य साधन करते करते इश्वर के प्रेम में विह्वल हो जाता है और संसार के दुःख इश्वर प्राप्ति में बाधक लगने लगते है, तो इस विरक्ति को साधन द्वारा उत्पन्न वैराग्य कहते है.
* परमात्म तत्व के ज्ञान से उत्पन्न वैराग्य – जब साधक परमात्म तत्व में स्थित हो जाता है तो संसार स्वतः ही सारहीन प्रतीत होता है. मीरा, कबीर और श्री रामकृष्ण परमहंस का प्रबल वैराग्य इसका उदाहरण है .

अन्य संतों के अनुसार वैराग्य के प्रकार इस प्रकार है –

* शमशान वैराग्य – जो संसार से मिले दुःख के बाद वैराग्य उत्पन्न होता है
* संतोष वैराग्य – जब मन में यह भाव उत्पन्न हो जाये तो कि इस संसार से मुझे सब कुछ प्राप्त हो चूका है , अब और प्राप्ति की इच्छा ना हो
* ज्ञान वैराग्य – जब संसार की अस्थिरता को समझकर सजगता के साथ त्याग किया जाए

तीव्रता के आधार पर वैराग्य तीन प्रकार का होता है –

* मंद – जब मन पल में वैराग्य की और जाए किन्तु शीघ्रता के साथ फिर संसार में लिप्त हो जाये तो यह मंद वैराग्य होता है . अधिकांशतः संसारियों का वैराग्य मंद प्रकृति का होता है .
* मध्यम – इस स्थिति में धीरे धीरे वैराग्य उत्पन्न होता है और धीरे धीरे इश्वर से प्रेम होता है .
* तीव्र – संसार में बिलकुल ही मन ना लगे और इश्वर को पाने की व्याकुलता इतनी तीव्र हो कि संसार विषतुल्य लगे एवं बिना इश्वर जीवन व्यर्थ लगे . सब कुछ मन से त्याग कर इश्वर प्राप्ति के प्रयासों में अथक रूप से लग जाये तो यह वैराग्य की तीव्र स्थिति होती है.

परम तत्व के ज्ञान के बाद उत्पन्न वैराग्य ही दृढ होता है. अन्य सभी अवस्थाओं में वैराग्य की स्थिति अस्थायी रहती है अर्थात परिस्थिति और विचार के अनुसार वैराग्य की भावना परिवर्तित होती रहती है. भय और विचार की स्थिति में सूक्ष्म वासनाएं बनी ही रहती है। सूक्ष्म वासनाएं ज्ञान और भक्ति को धीरे धीरे ऐसे ही समाप्त कर देती है जैसे दीमक चीजों को ख़त्म कर देती है. इसलिए यह स्थिति अस्थायी होती है। यही कारण है कि जो ज्ञान वैराग्य के बिना होता है वह ज्यादा उपयोगी और अर्थपूर्ण नहीं रहता . भय से और विचार से वैराग्य का प्रारम्भ तो किया जा सकता है किन्तु उसमे स्थिरता इश्वर के प्रति प्रेम के उपरान्त ही आती है. इश्वर के प्रति जब अनन्य प्रेम उत्पन्न होता है तो अंतःकरण शुद्ध होने लगता है . जब अंतःकरण शुद्ध होने लगता है तो विचार और भय का कोई स्थान नहीं रह जाता है. इससे साधक के उत्साह और आशा में वृद्धि होती है. साधक उत्तरोत्तर आनंद की उपलब्धि करता हुआ वैराग्य की स्थिति दृढ करता हुआ परमानंद को प्राप्त होता है.
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आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय कैसे करे

यद्यपि आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय के लिए गुरु और शिष्य दोनों का प्रयास आवश्यक है किन्तु उत्तरदायित्व शिष्य का ही अधिक होता है। गुरु का कार्य आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रवाह में बाधक तत्वों की पहचान करना और उनका समाधान निकालना होता है। इसके साथ केवल गुरु ही प्रचंड आध्यात्मिक ऊर्जा को शिष्य के धारण करने योग्य बना सकता है। किन्तु यह कार्य तभी संभव हो सकता है जब शिष्य के अंदर जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गुरु के द्वारा बताये हुए मार्ग पर चलने के लिए तन और मन से दृढ संकल्पित हो।

दृढ संकल्प की आवश्यकता इसलिए होती है जिससे मन की संशयात्मक प्रवृत्ति, चंचलता और अधीरता हमको अपने पथ से विचलित ना कर सके। जो शिष्य मन की मनमानी के समक्ष हार नहीं मानता है और निरंतर गुरु के दिशा निर्देशों का अभ्यास हर परिस्थिति में करता रहता है , वही अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को समझने और ईश्वर से मिलने का अधिकारी बनता है। जैसे भोजन किसी भी प्रकार से, कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है किन्तु उसको खाना स्वयं पड़ता है. भोजन के पाचन की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति की पाचन क्षमता कितनी अच्छी है. गरिष्ठ भोजन दुर्बल पाचन क्षमता वाले व्यक्ति को लाभ के स्थान पर हानि पंहुचा सकती है। अच्छी पाचन क्षमता के लिए व्यक्ति को स्वयं ही व्यायाम और अन्य भोजन सम्बन्धी नियमों का पालन करना पड़ता है। यह काम कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर सकता। वैद्य के द्वारा दी गयी औषधियों का उपयोग और उसके द्वारा बताये गए अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का पालन रोगी को स्वयं ही करना पड़ता है, तभी रोग का उपचार संभव होता है। उसी प्रकार गुरु द्वारा बताये गए उपायों और अन्य आध्यात्मिक नियमों का पालन शिष्य का उत्तरदायित्व होता है। जितनी लगन और विश्वास से इन नियमों का पालन किया जाता है आध्यात्मिक ऊर्जा उतना ही अधिक लाभ देती है।

आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय और संवर्धन के लिए समस्त नियमों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है। यह श्रेणियाँ इस प्रकार है –
* करणीय कर्म
* निषिद्ध कर्म

करणीय कर्म वह होते है जिनका पालन करना हर परिस्थिति में अनिवार्य है। यह कर्म है – आसन, प्राणायाम, सेवा, ध्यान, उपासना, स्वाध्याय, सत्संग, मन्त्र जाप, आहार शुद्धि, आत्म निरिक्षण, मौन, ब्रह्मचर्य इत्यादि का पालन यह सब करणीय कर्मों में आते है। करणीय कर्मों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि साधक कितनी चैतन्यता , संयम , धैर्य, विश्वास और नियमितता के साथ इन कर्मों का सम्पादन करता है। यहाँ पर यह स्मरण रखना आवश्यक कि किसी एक की भी कमी आध्यात्मिक ऊर्जा की मात्रा और गुणवत्ता प्रभावित कर सकती है।

निषिद्ध कर्म वह होते है जो किसी भी परिस्थिति में अनुशंसित नहीं होते है। यह कर्म है – हिंसा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मिथ्याचार, चोरी, शराब आदि मादक द्रव्य, निंदा, झूठ इत्यादि कर्मों से विरत रहना इत्यादि। अपने दोषों को समझकर उनको दुबारा ना दोहराने का संकल्प अर्थात उसको निषिद्ध करना यह साधक का उत्तरदायित्व होता है। साधक के अधिकतर दोष होते है – भावनाओं और परिस्थितियों में बह जाना , दूसरों के विषय में विश्लेषण करते रहना , वाद विवाद में पड़ना, अनावश्यक सोच विचार करते रहना ,अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराना और भगवान के अलावा अन्य लोगों से आशाओं और अपेक्षाओं के भंवर में पड़कर अपने समय और ऊर्जा की हानि करना इत्यादि।

करणीय कर्मों को कर के साधक आध्यात्मिक ऊर्जा का आह्वाहन करता है। इन कर्मों के निरंतर करते रहने से ऊर्जा की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार होता है और हमारे ग्रहण करने योग्य बन कर संचित कर्मों को क्रमशः समाप्त करती जाती है। जब साधक निषिद्ध कर्मों का त्याग करता है तो ऊर्जा नष्ट नहीं होती है वरन उसका संचय होता है । जिस प्रकार धन कमाना जितना महत्वपूर्ण है, संचय करने के लिए उसका अपव्यय रोकना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार यदि साधना में ऊर्जा के अपव्यय को नहीं रोका जाये तो करणीय कर्म अधिक लाभ नहीं दे पाते है।
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