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प्रकृति के विभिन्न रूपों में चेतना की मात्रा

इस संसार में उपस्थित प्रकृति के सभी व्यक्त और अव्यक्त रूपों में एक ही चेतना विद्यमान है . इस चेतना का प्रतिशत सब रूपों में अलग अलग होता है . ऊर्जा की अभिव्यक्ति को शास्त्रों में कला के रूप में व्यक्त किया गया है. सम्पूर्ण चेतना की मात्रा सोलह कला है .

प्रकृति के अन्य स्वरूपों में चेतना की मात्रा इस प्रकार है –
* पत्थर में चेतना की मात्रा – १ कला
* जल में चेतना की मात्रा – २ कला
* अग्नि में चेतना की मात्रा – ३ कला
* वायु में चेतना की मात्रा – ४ कला
* आकाश में चेतना की मात्रा – ५ कला
* वनस्पतियों और पशुओं में चेतना की मात्रा – ५ कला
* मनुष्यों में चेतना की मात्रा – ६ – ७ कला
* महापुरुषों, ऋषियों और मुनियों में चेतना की मात्रा – ९ कला

इश्वर के विभिन्न अवतारों में चेतना की मात्रा ९ कलाओं से अधिक होती है . जैसे भगवान् की राम अवतार में १२ कलाए थी. मनुष्य के अन्दर ही यह सामर्थ्य होती है कि अपनी अपूर्णता को सम्पूर्ण कर सके किन्तु प्रकृति के अन्य अभिव्यक्त रूपों में यह सामर्थ्य नहीं होती. इसलिए मनुष्य जीवन का सदुपयोग अत्यंत आवश्यक है.
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अध्यात्मिक उर्जा का क्षय कैसे हो जाता है

मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या ही यह है की वह उर्जा के नियमो से अवगत नहीं है. अध्यात्मिक शक्ति अर्थात  उर्जा का, मंत्र इत्यादि क्रियाओं से आहवाहन तो हो सकता है किन्तु दिव्य उर्जा को संचित कर उसका उचित समय पर उचित प्रयोग करना नही आता है.

इसके अलावा मनुष्य को इस बात का भी ज्ञान नहीं होता है ​कि ​ किस प्रकार ​​छो​टे ​​छो​टे नकारात्मक कर्मों द्वारा अपनी ​कठिनता से प्राप्त दिव्य उर्जा का नु​कसान ​ कर देता है.


उर्जा के क्षय ​का ​ सबसे प्रमुख कारण मन के सभी ​छो​टे और बड़े नकारात्मक विचार होते है. मन की किसी भी वस्तु , व्यक्ति अथवा परिस्थिति को लेकर सबसे पहली ​जो​ प्रतिक्रिया हो​ती ​ है वह है – विचार. विचारो की प्रवृत्ति या तो भूतकाल की​ ओर ​ रहती है या भविष्य की ​ओर ​ रहती है. अधिकंशतः विचार भूतकाल मे हो चुकी घटना मे संलग्न व्यक्ति अथवा वस्तुओं से हमारा भावनात्मक लगाव होने के कारण चलते रहते है. ऐसे विचारो मे अधिकांशतः विचार तुल​​नात्मक , निषेधात्मक और ​अपेक्षात्मक​ हो​ते ​ है जो ​कि ​ मानव मन को असहज बना देते है. भविष्य की आवश्यकता से अधिक चिन्ता भी मन को असंतुलित कर देती है.

भूतकाल और भविष्य काल में रहने से हो रहे शारीरिक और मानसिक  असंतुलन का कारण यह है कि वह शक्ति जो भविष्य का उचित ​निर्माण कर​ सकती ​ है और भूतकाल की असहज परिस्थितियों को पुनः उत्पन्न नहीं होने देती वर्तमान काल मे विद्यमान होती है . किन्तु मनुष्य कभी भी वर्तमान मे सहज हो कर नहीं रहता. वर्तमान का सही उपयोग ना कर पाने के कारण भविष्य ​की​ नयी शुभ सम्भावनाये स्वरूप नहीं ले पाती है. भूतकाल का कोई अस्तित्व नहीं होता है, किन्तु नकारात्मक विचारों द्वारा ​बार बार पोषित होने के कारण ​वह​ भविष्य ​में​ उसी प्रकार के व्यक्तियों से सम्बन्ध अथवा परिस्थित्यों के ​​​​​​निर्माण की सम्भावना को सबल बनाते है.

विचार अध्यात्मिक उर्जा को ​गति​ प्रदान करते है.         
  सका​रा​त्मक उर्जा समय रहते सही दिशा देने पर उत्तम आतंरिक और वाह्य परिस्थितियों का ​​निर्माण कर ​सकती​ है. किन्तु​ यदि​ ​अवांछनीय विचारो पर नियन्त्रण नहीं रखा जाये तो उर्जा का अनुकूल परिस्थितियों के ​​निर्माण​ ​के लिये उपयुक्त मा​त्रा ​ मे संचयन नहीं हो पाता है और सब कु​छ यथावत नकारात्मक रूप मे चलता रहता है.

​​जैसे कि हम सभी ​जा​नते है कि उर्जा का हस्तान्तरण पाँच विधियों के द्वारा होता है – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध उर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान अथवा व्यक्ति तक पहु​चा​ने के वाहक होते है. कटु , तीखे, क्रोधी, निन्दक और व्यंगात्मक शब्दों का यदि प्रयोग किया जाये तो उर्जा की हानि होती है. यही कारण है कि साधनकाल मे तथा अन्य समय मे भी किसी भी प्रकार से प्रेरित होकर अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये. किसी को अशीर्वाद दिया जाये अथवा श्राप ; दोनों ही स्थिति मे स्वयम की तपस्या से अर्जित की गयी उर्जा शब्दों के माध्यम से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित हो जाती है और उस समय की गयी इच्छा के अनुरूप दुसरे व्यक्ति को फल देती है .
तामसिक भोजन, मांस, मदिरा, धूम्रपान इत्यादी का उपयोग भी अध्यात्मिक शक्ति के ​ह्रास​ का प्रमुख ​कारण है.​ऐसा भोजन ​जब तक सम्पूर्णतः शरीर को अपने प्रभाव से मुक्त नहीं कर देता उर्जा स्तर को प्रभवित करता रहता है. ​ता​मसिक भोजन के ​उपरान्त उर्जा को व्यवस्थित होने मे 2-4 दिन सााधरणतयः ​ लग जाते है.

इसी प्रकार जब नकारात्मक विचार​धारा ​​ के साथ जब भोजन बनाया जाता है तो स्पर्श के साथ विचारों की उर्जा पदार्थों मे प्रवेश कर उसकी सात्विक शक्ति को कम कर देते है. नकारात्मक व्यक्तियों के साथ हाथ मिलाने , उनके द्वारा दिए हुए वस्त्र पहनना अथवा उनके वस्त्र पहनने  से भी उनकी ऊर्जा दूसरे व्यक्ति के अंदर प्रवेश कर अस्थिरता , बेचैनी और क्रोध जैसे अन्य विकार उत्पन्न  करते है।  सड़न इत्यादि से पैदा हुई और अन्य अप्रिय लग्ने वाली गंध वायु के माध्यम से नासिका से होती हुई सीधे सूक्ष्म​ शरीर को प्रभवित करती है और उर्जा भौतिक एवम सूक्ष्म शरीर के मध्य उर्जा मे असंतुलन पैदा करती है.

इन्ही सब ​कारणों से अध्यात्म​​ मे मन की शुद्धता , भोजन , वाणी और स्पर्श इत्यादि की सावधानी पर बहुत अधिक बल दिया गया है. य​दि ​ इन माध्यमो का सही उपयोग किया ​जाता​ है तो सकारात्मक उर्जा की ​गति ​अंदर की ​ओर होती है जि​ससे ​ उसका संचय होकर मात्रा मे वृद्धी होती है. इन माध्य​मों ​ का ​​ दुरूपयोग ​करने पर उर्जा की ​प्रवृत्ति ​ वाह्य और अधोमुखी हो जाती है जिससे संचित उर्जा का भी क्षय हो जाता है. य​ह ​ वाह्य ​प्रवृत्ति और अधोगामी ​गति तब तक रहती है जब तक सही प्रयासो और संकल्प के​ ​द्वारा उर्जा का मार्ग परिवर्तित ना किया जाये.
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ग्रहणशीलता का अर्थ

जब इश्वर की चेतना अर्थात शक्ति कण कण में विद्यमान है तो क्या कारण है कि हम उस ऊर्जा को ग्रहण नहीं कर पाते है. इसका मुख्य कारण है जाग्रति का अभाव. इस अभाव के कारण हम ऊर्जा के परम स्रोत को अपने अन्दर समाहित नहीं कर पाते है.

जाग्रति का अभाव अर्थात अज्ञानता का कारण है हमारे ज्ञान, कर्म और भक्ति के मध्य सही समन्वय का ना होना. जब इन तीनों के मध्य समन्वय नहीं होता है तो हमारी अशुद्धियाँ बढती जाती है. कभी ज्ञान के अधूरेपन के कारण कर्म सही नहीं होता और कभी भक्ति की कमी के कारण ज्ञान और कर्म दूषित हो जाते है. इस प्रकार यह चक्र निरंतर चलता रहता है और आत्मा के ऊपर अज्ञान का आवरण गहरा होता जाता है. हमारी अशुद्धियाँ ही हमें परम सत्य से दूर रखती है . एक सम्पूर्ण गुरु इन अशुद्धियों को भली प्रकार से समझता है और शिष्य को उनका विभिन्न माध्यमों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करा कर उनको दूर करने में शिष्य की पूर्ण सहायता करता है. अशुद्धियों को दूर करने के लिये शिष्य का उत्तरदायित्त्व निरंतर ग्रहणशील हो कर चलते रहने का है. आध्यात्मिक ज्ञान केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं रहता . जब तक ज्ञान को जीवन में उतारा ना जाये तब तक वह पुर्णतः समझ नहीं आता. अपनी प्रारंभिक बुद्धि से हमको जितना भी समझ आता है वह हमको धैर्य प्रदान करता है और हमारे कर्म को सही दिशा देकर भक्ति को दृढ करती है.

ग्रहणशील होने का अर्थ है – अपनी मान्यताओं , विचारधाराओ और स्वयं के सही एवं श्रेष्ठ होने की भावना को अपने ऊपर प्रभावी नहीं होने देना और गुरु द्वारा दिखाए गए मार्ग पर शरीर, मन और आत्मा की सम्पूर्ण शक्ति लगाकर निरंतर चलने का प्रयास करना. जब शिष्य अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ प्रयास करता है तो पूर्व जन्म के नकारात्मक कर्मों की उर्जा का रूपांतरण होने लगता है. इस रूपांतरण के कारण बुद्धि पर पड़ा हुआ आवरण हटने लगता है और जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण एवं नयी सामर्थ्य का जन्म होता है. रूपांतरण की यह प्रक्रिया सहज नहीं होती है. इसमें कई बाधाओं और पीडाओं का सामना करना पड़ता है जिससे पार केवल गुरु पर विश्वास और कर्मठ हो कर कर्म करने से जाया जा सकता है.
जब शिष्य अपने प्रयासों और सीमाओं से थक जाता है तो गुरु अपने ज्ञान, कर्म और भक्ति की शक्ति से शिष्य को संभालता है और सीमा से परे ले जाता है.
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दान का अर्थ, प्रकार, निर्धारण, योग्य बातें

दान का शाब्दिक अर्थ है – देना
​ ​
दान के पीछे यह सिद्धांत काम करता है कि जो हम देते है वही हम पाते है ।  सम्पूर्ण प्रकृति इसी सिद्धांत पर काम करती है. वृक्षों का फल और नदियों का जल स्वयं के लिए नहीं होता।   देवता भी वही कहलाता है जिसकी देने की प्रवृत्ति हो और संग्रह की प्रवृत्ति न हो।  ​

दान   के प्रकार –
​ ​अन्न दान , ज्ञान दान , गौ दान , औषधि दान , भूमि दान , कन्या दान ,  फल दान
​, समय दान , क्षमा दान , श्रम दान ​, आशीर्वाद , अंग दान

किसी भी दान की तीन श्रेणियां होती है –
​सात्विक दान – जब बिना किसी स्वार्थ के कर्तव्य निर्वहन हेतु दान किया जाता है तो वह सात्विक दान होता है .
राजसिक दान – पापों के प्रायश्चित और अन्य इच्छा पूर्ति के लिये जो दान किया जाता है वह राजसिक दान होता है
 तामसिक दान – अयोग्य व्यक्ति , प्रतिकूल समय और अशुद्ध व्यवहार के साथ दिया हुआ दान तामसिक दान कहलाता है .

 दान के छह मुख्य कारण है  –  
धर्म – पशु पक्षियों को अन्न देना , ऋषियों को जीवन यापन हेतु स्वेच्छा से दान करना , इश्वर की कृपा प्राप्त करने हेतु दान करना 
अर्थ – धन की प्राप्ति और अपनी विशेष इच्छाओं की पूर्ती हेतु दान करना। हेतु दान करना। इसको काम्य  दान भी कहते है।
काम –   स्त्रीगमन, सुरापान, शिकार और जुए के प्रसंग में अनधिकारी मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है।  
लज्जा – किसी की तुलना अथवा प्रतिष्ठा के कारण दान करना 
हर्ष – किसी शुभ समाचार की प्राप्ति के उपरान्त प्रसन्नता के कारण दिया हुआ दान 
भय – निंदा ,पाप , मृत्यु  अथवा अन्य किसी भय के कारण दिया हुआ दान 
​
ज्योतिष विज्ञान  और  दान –  ज्योतिष विज्ञान असमय किये हुए दान , कुपात्र को दिए हुए दान और अनावश्यक दान को प्रशस्त नहीं करता।  विशेष मुहूर्तों , विशेष व्यक्तियों और विशेष स्थान पर सुयोग्य दान की संस्तुति है।
​जिन खराब कर्मों को संतुलित करना है ​,  ग्रहों के माध्यम से उनका ज्ञान प्राप्त कर केवल  उन्ही का दान करना चाहिए।
​
दान का निर्धारण तीन  प्रकार से  होता है –
  1. सामर्थ्य
  2. श्रद्धा
  3. आवश्यकता


​दान का विज्ञान –
दान के द्वारा व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के कृत्यों / ऋणों को तटस्थ कर, अंतःकरण की शुद्धि करता है और  ईश्वर की कृपा प्राप्त करने योग्य  बनता है ।
​दान विशेषतः आसक्ति अर्थात मोह और अहंकार पर काम करता है।  ​जब हम दान करते है तो अधिकार की प्रवृत्ति ख़त्म होती है इसके फल स्वरुप मन में सहजता अर्थात खुलापन आता है

दान देते समय ध्यान रखने योग्य बातें – 
दान करते समय दाता को ईर्ष्या क्रोध अहंकार इत्यादि विकारों से दूर रहना चाहिये . मन मे प्रसन्नता और उत्साह होना चाहिये . ईश्वर ने दान करने के योग्य बनाया है और अपनी सेवा करने का अवसर दिया है , इस भाव को रखते हुए प्रेम के साथ दान करना चाहिये .जब भी हम दान करते है तो प्रतिफल की आशा रख कर दान नहीं करना चाहिए।  ​दान सुपात्र को ही देना चाहिए।  दान देने के उपरान्त पश्चाताप की भावना नहीं होनी चाहिए।  बिना विश्वास के दिया हुआ दान भी व्यर्थ हो जाता है।

आज काल अधिकतर लोगो मे दान देने की भावना घट रही है, इस के साथ ही जो संपन्न वा वैभव शाली लोग दान कर रहे है, उन मे से भी अनेक लोगो की भावना दान पर केन्द्रित ना हो कर दान के फल या अपनी तारीफ के लिये होती है, संपन्न लोग सोचते है कि जितना वो दान करेंगे उतना ही सम्मान मिलेगा।  वह  वयक्ति जो निष्पक्ष, निःस्वार्थ और सद्भावना से दान करता है वो ही स्वीकार्य होता है।   जो लोग किसी कामना से दान करते है या कोई स्वार्थ रखते है उनकी केवल कामना ही पूर्ण होती है . ऐसा दान स्वार्थ और पक्षपात की श्रेणी मे आ जाता है ऐसे दान का फल निकृष्ट होता है।

​हर धर्म कहता है वयक्ति को आमदनी का कुछ हिस्सा दान करना चाहिये . दान हमेशा फलता है और वयक्ति सुख, संपत्तिवान बनता है, व्यक्ति को वैभवशाली बनाता है,कुछ ही लोग दान के महत्व को समझते है, इस लिये वो अनगिनत बार बड़ी राशि दान सवरूप दे देते है . दान की भावना हर मनुष्य मे होनी चाहिये . चाहे कम या ज्यादा धन अर्जित करे अपनी भावना अनुसार व हैसियत के अनुसार दान अवश्य करना चाहिये .​ शास्त्र के अनुसार अपनी आय का दसवां हिस्सा दान हमेशा करना चाहिए।  कई समस्याओं का समाधान जाने अनजाने केवल इसी नियम से हो जाता है।
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इष्ट देव की पूजा की आवश्यकता क्यों

इश्वर निर्गुण , अनंत और सर्वव्यापी है , स्थान और समय से परे है किन्तु हमारा मन इन्द्रियों द्वारा सीमित होने के कारण इश्वर की सर्वव्यापकता और अनंतता को स्वीकार नहीं कर पाता है। इस अस्वीकार की स्थिति के कारण निर्गुण स्वरुप मन को स्थिर नहीं कर पाता  है . मन की क्रमिक उन्नति और स्थिरता के लिए इश्वर के सगुण  स्वरुप की अराधना का विधान किया गया है ।   

जब भी हम कोई कर्म करते है तो अधिकांशतः उसके पीछे कोई न कोई इच्छा अवश्य होती है . उस इच्छा पूर्ती के लिए उपयुक्त साधन की आवश्यकता होती है . साधन की सामर्थ्यता और अनुकूलता  व्यक्ति की सामर्थ्य को बढ़ा देती है।  इस बात को इस उदाहरण से समझे जैसे किसी भी यात्रा की सम्पूर्णता में लगने वाला  समय प्रयोग किये जाने वाले साधन पर निर्भर करता है।  यात्रा की सम्पूर्णता के लिये दूसरा पक्ष यह है की व्यक्ति / यात्री की सामर्थ्य भी अच्छी होनी चाहिए ।  एक ही यात्रा अलग अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग समय पर पूरी होती है . व्यक्ति शारीरिक रूप से कितना भी सामर्थ्यवान हो यदि वह यात्रा पैदल अथवा साईकिल से करे तो यात्रा का समय अधिक लगेगा . इसमें यदि साधक की सामर्थ्य कम हो तो यात्रा का समय और बढ़ जायेगा क्योंकि विश्राम की आवश्यकता अधिक पड़ेगी. यही यात्रा यदि कार अथवा हवाई जहाज से की जाये तो यात्रा का समय और भी कम किया जा सकता है, किन्तु इस अवस्था में आर्थिक सम्पन्नता की आवश्यकता पड़ती है . जैसे व्यवहार जगत में जीवन यापन के लिए नियमों की आवश्यकता होती है और हर नियम की अपनी कुछ सीमायें होती है , उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत के कुछ नियम होते है और उन नियमों की अपनी सीमाए होती है .

 साधारणतः सभी व्यक्ति यह समझते है कि हम किसी भी स्वरुप की अराधना कर सकते है किन्तु यहाँ पर यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इश्वर ने विभिन्न स्वरुप क्यों धारण किये ? यदि रूप धारण ही करना था तो एक स्वरुप से भी काम चल सकता था .इश्वर के विभिन्न रूप उस सर्वशक्तिमान इश्वर के विभिन्न गुणों और कार्यों का निर्धारण करते है . जैसे विद्या की प्राप्ति के लिए सरस्वती जी , विघ्नों को दूर करने के लिए गणपति जी और धन की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी जी की अराधना की जाती है।  क्योंकि उस विशेष स्वरुप में एक विशेष गुण के ऊर्जा की मात्रा अधिक होती है जिससे वह विशेष इच्छा पूर्ती शीघ्र होती है।  किन्तु इस का अर्थ यह नहीं होता कि सभी स्वरूपों की अराधना एक साथ कर ली जाये।  यदि किसी व्यक्ति के पास दस शयनकक्ष हो किन्तु वह सभी शयनकक्षों में एक साथ नहीं सो सकता। इसी प्रकार सभी स्वरूपों की अराधना एक साथ नहीं की जा सकती।  इष्ट देव इश्वर के उसी स्वरुप को बनाया जाता है जो जीव की ऊर्जा स्तर  के अनुकूल हो और उसके सबसे निकट हो।  इष्ट देवता ही कुण्डलिनी शक्ति अथवा आत्म ज्ञान के जागरण के लिए  प्रथम द्वार होते है . यदि प्रथम द्वार ही बंद हो तो दिव्य चेतना उर्जा  का प्रवाह सही नहीं हो पाता है .

हिन्दू पद्धति में मुख्यतः पांच इष्ट देवता सांसारिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए बताये गए है – सूर्य देव , शक्ति आराधना (दुर्गा , लक्ष्मी , सरस्वती) , भगवान् विष्णु और उनके अन्य अवतार और भगवान् शिव . दक्षिण भारत में  कार्तिकेय भगवान् को इष्ट देवता का स्थान दिया गया है . निम्नलिखित देव ग्रहों के अधिपति है – t

• सूर्य —विष्णु , रमा, शिव
• चन्द्र —कृष्ण, शिवा, पार्वती
• मंगल – हनुमान , श्री नरसिम्हा, दुर्गा 
• बुध — विष्णु
• गुरु — विष्णु, श्री वामन, दत्तात्रेय
• शुक्र – महा लक्ष्मी, परशुराम , माँ गौरी
• शनि – हनुमान, कूर्मा, शिव, विष्णु
• राहु – माँ दुर्गा
• केतु – गणेश , मतस्य

ग्रहों के माध्यम से व्यक्ति की उर्जा का स्तर और अनुकूलता का निर्धारण कर इष्ट का निर्धारण किया जाता है।  ग्रह अत्यंत महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है उस अनन्त को पाने के लिए ।  एक जागृत और सिद्ध गुरु शिष्य के शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक स्तर को ग्रहों के माध्यम से ज्ञात कर विभिन्न स्तरों को संतुलन करने हेतु उपयुक्त इष्ट देव और मंत्र का चुनाव करता है।  जब  सही  इष्ट की आराधना और सही मंत्र का निरंतर जाप किया जाता है तो शरीर , मन और आत्मा के मध्य  नकारात्मक कर्मों की बाधाएं हटने लगती है और परम चेतना से संपर्क  स्थापित होने लगता है।
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वैराग्य जीवन

वैराग्य अर्थात्‌ न ‘वैर’ हो न ‘राग’ हो। विषयों के साथ रहते हुए भी मन का उनसे लिप्त ना होना ही वैराग्य है.

वैराग्य निम्नलिखित कारणों से होता है –

* भय के कारण उत्पन्न वैराग्य – नरक के भय से संसार के विषयों से दूर हो जाने वाला वैराग्य
* विचार के कारण उत्पन्न वैराग्य – जो सत्संग और गुरु की कृपा के कारण उत्पन्न सत्य और असत्य के विवेक द्वारा संसार के विषयों से अलग होता है
* साधन के कारण उत्पन्न वैराग्य – जब मनुष्य साधन करते करते इश्वर के प्रेम में विह्वल हो जाता है और संसार के दुःख इश्वर प्राप्ति में बाधक लगने लगते है, तो इस विरक्ति को साधन द्वारा उत्पन्न वैराग्य कहते है.
* परमात्म तत्व के ज्ञान से उत्पन्न वैराग्य – जब साधक परमात्म तत्व में स्थित हो जाता है तो संसार स्वतः ही सारहीन प्रतीत होता है. मीरा, कबीर और श्री रामकृष्ण परमहंस का प्रबल वैराग्य इसका उदाहरण है .

अन्य संतों के अनुसार वैराग्य के प्रकार इस प्रकार है –

* शमशान वैराग्य – जो संसार से मिले दुःख के बाद वैराग्य उत्पन्न होता है
* संतोष वैराग्य – जब मन में यह भाव उत्पन्न हो जाये तो कि इस संसार से मुझे सब कुछ प्राप्त हो चूका है , अब और प्राप्ति की इच्छा ना हो
* ज्ञान वैराग्य – जब संसार की अस्थिरता को समझकर सजगता के साथ त्याग किया जाए

तीव्रता के आधार पर वैराग्य तीन प्रकार का होता है –

* मंद – जब मन पल में वैराग्य की और जाए किन्तु शीघ्रता के साथ फिर संसार में लिप्त हो जाये तो यह मंद वैराग्य होता है . अधिकांशतः संसारियों का वैराग्य मंद प्रकृति का होता है .
* मध्यम – इस स्थिति में धीरे धीरे वैराग्य उत्पन्न होता है और धीरे धीरे इश्वर से प्रेम होता है .
* तीव्र – संसार में बिलकुल ही मन ना लगे और इश्वर को पाने की व्याकुलता इतनी तीव्र हो कि संसार विषतुल्य लगे एवं बिना इश्वर जीवन व्यर्थ लगे . सब कुछ मन से त्याग कर इश्वर प्राप्ति के प्रयासों में अथक रूप से लग जाये तो यह वैराग्य की तीव्र स्थिति होती है.

परम तत्व के ज्ञान के बाद उत्पन्न वैराग्य ही दृढ होता है. अन्य सभी अवस्थाओं में वैराग्य की स्थिति अस्थायी रहती है अर्थात परिस्थिति और विचार के अनुसार वैराग्य की भावना परिवर्तित होती रहती है. भय और विचार की स्थिति में सूक्ष्म वासनाएं बनी ही रहती है। सूक्ष्म वासनाएं ज्ञान और भक्ति को धीरे धीरे ऐसे ही समाप्त कर देती है जैसे दीमक चीजों को ख़त्म कर देती है. इसलिए यह स्थिति अस्थायी होती है। यही कारण है कि जो ज्ञान वैराग्य के बिना होता है वह ज्यादा उपयोगी और अर्थपूर्ण नहीं रहता . भय से और विचार से वैराग्य का प्रारम्भ तो किया जा सकता है किन्तु उसमे स्थिरता इश्वर के प्रति प्रेम के उपरान्त ही आती है. इश्वर के प्रति जब अनन्य प्रेम उत्पन्न होता है तो अंतःकरण शुद्ध होने लगता है . जब अंतःकरण शुद्ध होने लगता है तो विचार और भय का कोई स्थान नहीं रह जाता है. इससे साधक के उत्साह और आशा में वृद्धि होती है. साधक उत्तरोत्तर आनंद की उपलब्धि करता हुआ वैराग्य की स्थिति दृढ करता हुआ परमानंद को प्राप्त होता है.
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